रेप है क्या जातियों का खेल?

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रेप है क्या जातियों का खेल?

बहुत खेल लिया एक दूसरे को इल्जाम लगाने का खेल,
रेप के नाम पर जातियों का खेल,
कैसे ऐसे ख्याल आ जाते हैं इतना सब होने के बाद भी,
भगवान ना करे हो यह तुम्हारी बेटियों के साथ भी।

कभी तो शर्म का पर्दा औड़ लिया करो,
पर्दे की जरूरत लड़कियों को नहीं है यह भी सोच लिया करो,
जरूरत तो उस छोटी सोच को है जो इंसानियत का मज़ाक बना बैठी है,
आज हर माँ अपनी बेटी के लिए गुहार लगा बैठी है।

मैं सभी माँ-बाप से बस इतना कहना चाहती हूँ,
मैं डर के सहम के नहीं, यह जिंदगी अपनी मर्जी से जीना चाहती हूँ,
नहीं आई हूँ मैं इस जिंदगी में किसी से भी झुकने के लिए,
सितम अब बहुत हो गए जो इस दुनिया ने दिए।

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जख्म कम थे क्या जो अब ताने भी सुनने पढ़ते हैं,
आबरू को बचाने के लिए इन दरिंदों के हाथ जोड़ने पड़ते हैं,
क्यों इंसाफ चौखट नहीं खटखटाता?
क्यों जीते जी मुझे बचाया नहीं जाता?

कब अपनी बेटियों को लड़ना सिखाओगे,
इन दरिंदों के मुंह तोड़ना सिखाओगे,
मत डरो अपनी बेटियों को रानी लक्ष्मीबाई बनाने से,
बनाओ उसे ऐसा जमाना डरे उसकी तरफ उंगली उठाने से।

यह समय वो नहीं है जो लड़कियों को दामन से समेट कर रखा जाए,
दौर अब वह है जो अपनी बेटियों को काली माँ का रूप सिखाएँ,
मत सिखाओ उसे गलत सहना,
मत बोलो अब यह क्या पहना,
हिम्मत दो उन्हें उनकी जिंदगी जीने की,
इस कीचड़ में भी कमल की तरह खिलने की।

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हौसला बनो उनका उन्हें और कमज़ोर मत बनाओ,
हालातों से हारना नहीं, उन्हें लड़ना सिखाओ,
आँखें ना झुके उनकी किसी के घूरने पर,
हाथ उठे उनका कुछ भी गलत सुनने पर।

सिर्फ ऐसे बैठकर हम सब सही होने की गुंजाइश नहीं कर सकते हैं,
कुछ रास्ते हम अपने भी बना सकते हैं,
मंजूर है मुझे उस दरिंदे को मारकर जिंदगी भर जेल जाने का फैसला,
बहुत बेहतर होगी वह जिंदगी जहां खुद से नजरें मिला पाऊंगी,
जब मैं अपनी सुरक्षा खुद कर पाऊंगी।

हारने वालों में से नहीं होती है लड़कियाँ कभी,
लेकिन उन मासूमों की क्या गलति होगी जिन्हें समझ भी नहीं अभी,
वक्त नहीं है अब दुआओं में हाथ उठाने का,
वक्त है अब पापों से लड़के खुद के साथ-साथ और बहनों को भी बचाने का।

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