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जाने क्या ज़ोर है तेरे इश्क़ का मुझपे

जाने क्या ज़ोर है तेरे इश्क़ का मुझपे

Hindi poem
वो होता है न, जो तू मूड़ के न देखती थी आँखों को जाने क्यूँ नम कर देती थी, जाने क्या ज़ोर है तेरे इश्क़ का मुझपे हल्का- हल्का मुझे तंग कर देती है। वक़्त की बात है, बदलता रहता है आज मैं हूँ तो आँखें कह रही है, डर लगता है कहीं न रहा तो मेरे होंठ झूठ भी न कह पाएँगे। जब जब दर्द का बादल छाया आंशु आँखों तक आया, तब तब दिल को यही समझाया दिल आखिर तू क्यूँ रोता है, ये जो गहरे सन्नाटे हैं वक़्त ने सबको बांटें हैं, दिल....आखिर तू क्यूँ रोता है। जो तू रूठ गयी थी, वक़्त थम गया था हर बीता लम्हा, जैसे गुजरे वर्ष जैसा था, गैरों की खबर थी और मेरा मन पराया था और जब तू मुड़ के देखी एक मर्तबा फिर खुद के होने पे यकीन आ गया। क्या हुआ जो न रहा मैं पिघले नीलम सा समा नीले नीले सी खामोशियाँ, तुम्हें एहसास दिलाएगी की एक मैं हूँ यहा सिर्फ मैं हूँ, मेरी सांसे है और मेरी धड़कनें हैं, जो मेरे
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