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Hindi poem

थक जाती है जुबा मेरी जिंदगी से जब

थक जाती है जुबा मेरी जिंदगी से जब

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थक जाती है जुबा मेरी जिंदगी से जब, शिकायत करने लगता हूं ऐसा नहीं है कि मैं मौत से डरता हूं भागना नहीं सिखाया तूने मुझे खुदा पर क्या दिया है जीवन जीने को यह तो बता। खत्म करने को जिंदगी कभी मन करने लगता है जो दिल दिया है कभी यह भी टूटा करता है कब तक ऐसे जीना गवारा हो पाएगा जब सब कुछ बर्बाद होता जाएगा। ऐ खुदा बस बहुत हो गया तेरा मुझे सताना ऐसे मेरे आंसुओं का बेहते जाना थक चुका हूं अब थोड़ा सा आराम दे दें इस दुनिया से दूर अपनी घर में अब पेगाम दे दें।
काश खता की सजा मिलती

काश खता की सजा मिलती

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काश खता की सजा मिलती पर यू ना बेवजह मिलती दर्द देकर खुशी देने का फायदा क्या बेवजह साथ रहने का फायदा क्या। हंसी भी दर्द देने लगी है यादें भी तनहा करने लगी हैं जख्मों से ख्याल भरे हैं बीते हुए लम्हें हमें ले कर बह रहे हैं। कैसे हकीकत छुपाऊ खुदसे जब लोगों की नज़रे सवाल किया करती हैं मुझसे भर आती है आंखें मेरी क्योंकि चुब जाती हैं इस कदर बातें तेरी तब भी मुस्कुराती रहती हूं क्योंकि दूसरे मुझसे जुड़े हैं मैं तो बस यही हकीकत कहती हूं।
जिंदगी से हार

जिंदगी से हार

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जब हम जिंदगी से हार जाते हैं, तब हम अपनी सारी उम्मीदें तोड़ जाते हैं, हर जगह अंधेरा दिखाई देता है, कुछ नहीं बचा हमें यह मान कर बैठ जाते हैं। वह सुबक-सुबक कर रोना मनज़ूर हो जाता है, जब हौसले का बांध टूट जाता है, जब सब चीज़े खलने लगती है, तभी सिर्फ निराशाएँ दिखने लगती हैं। आँखो के आंसू मंजिल के रास्तों को धुंधला कर देते हैं, हम भी नाकामयाबी को अपनी जिंदगी समझ लेते हैं, अंधेरे से प्यार होने लगता है, इसे हम अपना मुकद्दर कहते हैं। दिल में क्या-क्या छुपा रखा है, वह दर्द ही है जिसने सीने में आग को जला रखा है, सर को हमेशा उठाकर चलना, इस दामन को बचा कर चलना, रास्ते बहुत खराब है जिंदगी के, तू किसी की ना सुनना बस अपनी धुन में चलना।
जीने की ज़रूरत

जीने की ज़रूरत

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तू ही जीने की ज़रूरत बन गया है, तेरे होने से ही मुझे सब मिल गया है, पूरी होती हूं जब तू मेरे पास होता है, तुझसे थोड़ा-सा भी दूर होकर दिल ये मेरा रोता है। सपने बुने तो थे किसी के आने के, वो अनकही बातों को सच बनाने के, दिल को कुछ इस तरह छू जाने के, किसी के आकर न जाने के। यू जकड़ लिया है तुम्हारे प्यार ने, के अब तुम्हारे सिवा कुछ दिखाई नहीं देता, अब न ही यह दिल तुम्हारे बिना है रहता। कौन कहता है कि रास्ते भूले नहीं जाते, मंजिल मिलने पर कौन हैं दर-ब-दर डगमगाते, मुझे तो बस इतना पता है, कि तुम्हारे सिवा मैं क्या सब कुछ लापता है।
हमने खुदको पूरा करना सीखा!

हमने खुदको पूरा करना सीखा!

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जिसको प्यार करके हमने खुदको पूरा करना सीखा, जिसकी निगाहों को देखकर हमने जीना सीखा, आज उसी की मुस्कुराहत हमें जिंदा कर देती है, जब वो पलभर के लिए मुझे निगाहें भरकर देख लेती है। उसके प्यार ने मेरे अकेलेपन को तोड़ा है, हर रास्ता उसने मेरा अपनी तरफ़ मोड़ा है, संजोए रखा है उसने मुझे और मेरे प्यार को, हिम्मत है वो मेरी जैसे भी रहे मेरे हालात हो। गरूर बन गयी है वो मेरा जबसे ज़िदगी में आयी है, मेरी खुशियों को अपने साथ जिंदा कर लायी है, उससे बढ़कर मेरी जिंदगी में अब और कुछ नहीं रहा, वो ही बन गयी है मेरे जीने की हर एक व़जहा।
जो तेरी हँसी को देखा इस बार

जो तेरी हँसी को देखा इस बार

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जो तेरी हँसी को देखा इस बार बेरहम-सी जिंदगी फिर से गुलजार हो गयी है, एक फरियाद मेरे दिल में दबी थी जैसे वो हँसी देख कर मैं फिर से जी गया। उम्मीद तो न थी तुझसे मिलने की आँखें चुराने का मन होता था, किस्मत का खेल है जनाब! जिस नफ़रत को अपना लिया था मैंने, आज उसी नफ़रत ने मुझे फिर से तेरा दीवाना कर दिया। तुमसे नज़रें क्या मिली रौशन फिज़ाएँ हो गयी आज बादलों का अलग रंग है, चुभती सूरज की किरण भी अलग नूर बिखेरे है मौसम बदलने लगा है जैसे, शायद तुझसे इश्क़ दुबारा कर बैठा हूँ। रेखाओं का खेल है मुकद्दर रेखाओं से मात खा रहा हूँ, पर होता है न की हारने का अपना मज़ा है तेरी नफ़रत के आगे हार तो गया था, पर उस हँसी को क्या बयां करूँ जिसके आगे मेरा इश्क़ फिर से जीत गया। जानता हूँ कुछ हो नहीं सकता है मेरे इश्क़ का पर तुमसे जब बच के गुज़रता हूँ, तो लगता है वो नज़र चुप के मुझे देख रही है और खु
वो पहली झलक!

वो पहली झलक!

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याद है वो पहली झलक जिस रोज़ तुझे देखा था, कुछ महसूस दिल को हुआ कुछ अंदर ही बस के रह गया। हुई न हिम्मत तुमसे कुछ कहने की दिन बीत गए एक लफ्ज़ कहने में, आया वो दिन जब खुसनसीबी मुझसे मिली घर कर गये तेरे कहे हुए वो शब्द मेरे सिने में। उसी वख्त दिल ने कुछ हरकत की इश्क़ में इतना हारा मैं, ये तेरे नजरों ने क्या किया शायद मुझे तुझसे प्यार हो गया। गिर तो गया था मैं तेरे प्यार में ध्यान कहाँ था आने वाले उस ज्वार का, हाँ हो गयी वो गलती मुझसे सच्चा सा प्यार जो कर बैठा। पर तुझे तो उस राह की मंज़िल प्यारी थी जिसका राही भी तू और कसौटी भी तू, दिल करता था तुझसे कहूँ, तेरी आशिक़ी तेरे नाम कर दूँ सौदा तेरी वफ़ाई का कर हीं लिया था, तेरी रेत की परछाईं को अपना मुकद्दर चुन हीं लिया था। फिरता हूँ अब मारा-मारा मैं जाने कौन है तू मेरी मैं ना जानु, तब भी खुद को बर्बाद करता हूँ फना हो के तुझ
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